भारतीय राजनीतिक दलों की समस्याएं

हमारे इस लेख में हमने भारतीय राजनीतिक दलों की समस्याएं पे बात की है, ताकि आप भारतीय के राजनीतिक दलों स्थिति के बारे में आसानी और विस्तार से समझ पाए तो आइये जानते है बिना किसी देरी के भारतीय राजनीतिक दलों की समस्याएं को।

भारतीय राजनीतिक दलों की समस्याएं

भारतीय राजनीतिक दलों की समस्याएं
भारतीय राजनीतिक दलों की समस्याएं

भारत में सरकार की संसदीय प्रणाली है। सरकार की संसदीय प्रणाली राजनीतिक दलों के बिना काम नहीं कर सकती। भारतीय राजनीतिक दलों में कई समस्याएं हैं, जिनमें से मुख्य हैं:

  • संगठनात्मक समस्याएँ(Organization Problem)
  • दलबंदी(Grouping)
  • दलबदली (Defections)
  • नेतृत्व का संकट(A Crisis of Leadership)
  • आर्थिक समस्या(Financial Problem)
  • जाति और धर्म का महत्व( Importance of caste and Religion)
  • राजनीतिक दलों के अप्रत्याशित गठबंधन(Non- principled Alliance of Political Parties)
  • राजनीतिक दलों में लोकतंत्र का अभाव
  • राजनीतिक दलों में खुली बहस का अभाव
  • राजनितिक भ्रष्टाचार
  • बहुदलीय प्रणाली(Multi Party System)
  • उचित विकल्पों का अभाव(Lack of Proper Alternative)
  • क्षेत्रीय राजनीतिक दलों का प्रभाव बढ़ा (Increase in influence of Regional Political Parties)

संगठनात्मक समस्याएँ(Organization Problem)

संगठनात्मक समस्याएं प्रायः सभी राजनीतिक दलों में पाई जाती हैं। 1969 के विभाजन से पहले, कांग्रेस एक संगठित और व्यापक संगठन था। सत्तारूढ़ कांग्रेस ने पार्टी की संगठनात्मक समस्याओं को उजागर किया। सत्तारूढ़ कांग्रेस 1971 से 1977 तक अपने संगठन के बल पर सत्ता में रही, जबकि कांग्रेस(s) संगठन की कमी के कारण बिखर गई। 1977 में कांग्रेस की हार के बाद, कांग्रेस में गुटबाजी को फिर से परिभाषित किया गया और इस तरह पार्टी कमजोर हो गई। हालांकि कांग्रेस(i) 1980 से नवंबर 1989 तक सत्ता में रही, लेकिन उसका संगठन बहुत संगठित नहीं था । कांग्रेस(i) का गठन 1978 में हुआ था, लेकिन इसके संगठनात्मक चुनाव 1992 में हुए थे। दोनों कम्युनिस्ट पार्टी संगठन आधारित हैं, लेकिन उनका संगठन बहुत राष्ट्रव्यापी नहीं है क्योंकि उनका प्रभाव पश्चिम बंगाल, त्रिपुरा और केरल तक सीमित है। पूर्व जनसंघ और वर्तमान भारतीय जनता पार्टी के पास संगठन है। इसके पास कार्यकर्त्ता की कमी नहीं है, लेकिन इसका प्रभाव पूरे भारत में महसूस नहीं किया जाता है। बहुजन समाज पार्टी और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी का प्रभाव बेहतर संगठन की कमी के कारण सीमित है।

दलबंदी(Grouping)

प्रायः सभी राजनीतिक दलों में गुट पाए जाते हैं। पार्टियों के प्रभावी संगठन के रास्ते में एक बड़ी बाधा के रूप में। दलबंदी के कारण 1969, 1978 और 1995 में कांग्रेस अलग हो गई। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी में दलबंदी के कारण तीन पार्टियाँ बनीं – भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी, मार्क्सवादी पार्टी और मार्क्सवादी लेनिनवादी पार्टी। डी.ऐम.के की गुटबाजी के कारण विभाजन हुआ और अन्ना डी.ऐम. का गठन हुआ था, जनता पार्टी भी दलबंदी के कारण चार दलों में विभाजित हुई। जनता पार्टी, भारतीय जनता पार्टी, जनता (s) और लोक-दल। गुटबाजी के कारण अकाली दल भी कई बार बंट चुका है। 1990 में जनता दल गुट का विभाजन हुआ और जनता दल(s) का गठन हुआ। बाद में इसे जनता दल(अ) और जून 1994 में जनता दल(ज) में विभाजित किया गया। राजनीतिक दलों में गठबंधन व्यक्तिगत भेदभाव पर आधारित होता है न कि वैचारिक आधार पर।

दलबदली(Defections)

प्राय: सभी राजनीतिक दल दलबदली की समस्या का सामना करते हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि कभी-कभी अगर एक पार्टी को दलबदली से फायदा होता है, तो वो दलबदली रोकने की मांग नहीं करता है। संविधान के 52 वें संशोधन ने दलबदल जैसी बुराई को रोकने का काम किआ है। लेकिन अभी भी दलबदली के कई उदाहरण मिलते हैं। जैसे अगस्त 1993 में, जनता दल(अ) के सात सदस्य कांग्रेस(i) में शामिल हो गए। दिसंबर 1993 में पार्टी के दलबदली के कारण कांग्रेस(i) को लोकसभा में बहुमत हासिल हुआ। अप्रैल-मई, 1996 के आम चुनावों से पहले और बाद में, एक बड़े स्तर पे दलबदली हुई थी । जनवरी 2004 में पारित एक संवैधानिक संशोधन ने यह प्रावधान किया कि संसद या राज्य विधानमंडल के किसी भी सदस्य को सदस्यता से अयोग्य घोषित किया जाएगा जो दलबदली में शामिल होगा ।

नेतृत्व का संकट(A Crisis of Leadership)

प्रायः सभी दलों के नेताओं को देखते हुए, ऐसा लगता है कि देश में नीति और युवा नेताओं की कमी है। राजनीतिक दलों का नेतृत्व अक्सर उनके हाथों में होता है जिनकी उम्र 60 और 70 या उससे अधिक होती है। ऐसा लगता है कि देश के प्रतिभाशाली युवाओं को राजनीति में शामिल होना पसंद नहीं है।

आर्थिक समस्या(Financial Problem)

संसद और विधानसभा चुनावों के लिए करोड़ों रुपये की जरूरत होती है। राजनीतिक दल अधिक से अधिक धन जुटाने की कोशिश करते हैं, ताकि चुनाव में पैसा पानी की तरह बह सके। राजनीतिक दलों के लिए आय का मुख्य स्रोत सदस्यता शुल्क, दान और राजकोष संचालन है। प्रायः सभी दल पूंजीपतियों और उद्योगपतियों से धन लेते हैं। पैसा देने वाले लोग इसका फायदा उठाना चाहते हैं। इसीलिए कहा जाता है कि कोई भी दल सत्ता में आए, पूंजीपतियों के हित को दरकिनार नहीं किया जा सकता है। इसके अलावा, राजनीतिक दल कोष से प्राप्त सदस्यता शुल्क और धन का विवरण प्रकाशित नहीं करते हैं। काले धन का भारतीय राजनीति पर विनाशकारी प्रभाव पड़ा है।

जाति और धर्म का महत्व( Importance of caste and Religion)

बेशक, भारत एक धर्मनिरपेक्ष राज्य है और सभी प्रमुख राष्ट्रीय राजनीतिक दल जाति और धर्म के खिलाफ बोलते हैं। लेकिन बिहार में, योग्य उम्मीदवारों के बजाय, टिकट उन लोगों को दिया जाता है जिनकी जाति का उस निर्वाचन क्षेत्र में बहुमत होता है। चुनाव प्रचार में, सभी राजनीतिक दल अक्सर जाति और संप्रदायवादी भावनाओं का फायदा उठाने की कोशिश करते हैं। कई राजनीतिक दल जैसे अकाली दल, डी.ऐम.के. , मुस्लिम लीग, बहुजन समाज पार्टी आदि जाति और धर्म पर आधारित हैं। भारत के भविष्य के लिए जातिगत राजनीति बहुत खतरनाक है।

राजनीतिक दलों का सिद्धांतहीन गठबंधन(Non- principled Alliance of Political Parties)

भारतीय पार्टी प्रणाली की एक महत्वपूर्ण समस्या यह है, कि राजनीतिक दल अपने हितों की पूर्ति के लिए सिद्धांतहीन गठबंधन बनाने के लिए हमेशा तैयार रहते हैं। जनवरी 1980 के लोकसभा चुनावों में, सभी दलों ने सिद्धांतहीन गठबंधन बनाए। उदाहरण के लिए अन्ना डी.एम. के. केंद्रीय स्तर पर लोकदल सरकार में शामिल था, लेकिन जनता पार्टी के खिलाफ चौधरी चरण सिंह के साथ सहयोग करने के लिए प्रतिबद्ध था। और दूसरी ओर, इस पार्टी ने तमिलनाडु में जनता पार्टी के साथ चुनावी गठबंधन बनाया। कांग्रेस अन्य दलों के समझौतों को सिद्धांतहीन मानती थी तमिलनाडु में वह भी डी.ऐम.के. के साथ गठबंधन में आई । आपातकाल में, श्रीमती गांधी ने डी.ऐम.के. के करुणानिधि की सरकार को भ्रष्टाचार के आरोपों में बर्खास्त कर दिया गया था। 1989 के लोकसभा चुनावों में, जनता दल ने भारतीय जनता पार्टी और मार्क्सवादी पार्टी के साथ मिलकर चुनाव लड़ा। जबकि भारतीय जनता पार्टी और मार्क्सवादी पार्टी की नीतियां विरोधाभासी हैं। 1991 के चुनावों के बाद से आज 2020 तक लगभग सभी दल सिद्धांतहीन समझौते किये हैं।

राजनीतिक दलों में लोकतंत्र का अभाव

भारतीय राजनीतिक दलों पे मुख्य आरोप यह है कि जिन राजनीतिक दलों पर लोकतंत्र की प्रतिष्ठा बनाए रखने की जिम्मेवारी है, वे अपनी ही पार्टियों में लोकतंत्र की स्थापना नहीं कर पाए हैं। राजनीतिक दलों के संगठनात्मक चुनाव कई सालों तक नहीं होते हैं। पार्टी का कामकाज पूरी तरह से नामांकित और अंतरिम नेताओं द्वारा चलाया जा रहा है। इससे राजनीतिक दलों में पक्षपातपूर्ण तानाशाही की प्रवृत्ति पैदा हुई है। जहां आम जनता से जुड़े कार्यकर्ता उपेक्षित महसूस करते हैं, वहीं नए कार्यकर्ताओं ने पक्षपात और नेतृत्व की भावना के साथ पार्टियों के कामकाज को संभाल लिया है।

राजनीतिक दलों में खुली बहस का अभाव

दलीय मंच पर राजनीतिक दलों की नीति की खुली चर्चा नहीं हो रही है जैसा कि होना चाहिए और असंतोष के स्वर को विद्रोह या असंतोष के नाम पर एक अलग स्वर के साथ देखा जा रहा है।

राजनितिक भ्रष्टाचार

भारतीय राजनीतिक प्रणाली की एक महत्वपूर्ण समस्या यह है कि राजनीतिक भ्रष्टाचार की प्रवृत्ति भारतीय राजनीतिक दलों के नेताओं के बीच उत्त्पन्न हुई है। 1967 के बाद से भ्रष्टाचार ने भारतीय राजनीति में अपनी जगह बना ली है। 1980 में, श्रीमती इंदिरा गांधी ने अपने घोषणा पत्र में भारत से भ्रष्टाचार को खत्म करने की बात कही थी। आम तौर पर, सभी राजनीतिक दल चुनाव के दौरान एक-दूसरे पर भ्रष्टाचार का आरोप लगाते हैं। राज्य के नेता आम तौर पर चुनाव जीतने के लिए भ्रष्ट साधनों का उपयोग करते हैं। मंत्रियों के बीच भ्रष्टाचार के आरोपों को देखना आम है। आरोप है कि हाल के घोटालों में कोई न कोई मंत्री शामिल रहा है। राजनीति में भ्रष्टाचार भारत के सबसे बड़े लोकतंत्र के लिए हानिकारक है। यही कारण है कि 11 वीं, 12 वीं और 13 वीं लोकसभा चुनाव की पूर्व संध्या पर, सभी राजनीतिक दलों ने भ्रष्टाचार को समाप्त करने की घोषणा की।

बहुदलीय प्रणाली(Multi Party System)

भारतीय पार्टी प्रणाली का एक महत्वपूर्ण दोष बहुदलीय प्रणाली है। दुनिया के कई देशों में मल्टीपार्टी सिस्टम पाया जाता है। लेकिन उन देशों में राजनीतिक दलों की संख्या भारत में उतनी नहीं है। अधिक दलों का होना संसदीय शासन प्रणाली के लिए बहुत हानिकारक है। किसी भी पार्टी के लिए स्पष्ट बहुमत की अनुपस्थिति में, कई दल अप्रत्याशित और सिद्धांतहीन समझौता करके सरकार बनाते हैं और ऐसी सरकार अस्थिर और कमजोर होती है।

उचित विकल्पों का अभाव(Lack of Proper Alternative)

भारत में कांग्रेस के लंबे समय के शासन के बाद, यह राष्ट्रीय स्तर पर एक व्यवहार्य विकल्प नहीं बन था। 9 वीं, 10 वीं, 11 वीं और 12 वीं लोकसभा में किसी भी पार्टी को लोकसभा में स्पष्ट बहुमत नहीं मिल सका। और 9 वीं लोकसभा को केवल 15 महीने और 11 वीं लोकसभा में 18 महीने के बाद त्रिशंकु संसद के कारण भंग करना पड़ा। था 12 वीं लोकसभा को केवल 13 महीनों के बाद भंग कर दिया गया था।

क्षेत्रीय राजनीतिक दलों के प्रभाव का बढ़ना (Increase in influence of Regional Political Parties)

भारतीय राजनीतिक प्रणाली का एक मुख्य दोष यह है कि राष्ट्रीय दलों का महत्व कम हो रहा है और क्षेत्रीय दलों का प्रभाव तेजी से बढ़ रहा है। पंजाब में अकाली दल, हरियाणा में इंडियन नेशनल लोकदल, तमिलनाडु में डी. ऐम.के. और अन्ना डी.ऐम.के. बिहार में राष्ट्रीय जनता दल और जनता दल यूनाइटेड, असम में असम गण परिषद, आंध्र प्रदेश में तेलुगु देशम, महाराष्ट्र में शिवसेना, मिज़ोरम में मिज़ो नेशनल फ्रंट जैसे क्षेत्रीय दल बहुत महत्वपूर्ण हैं। और इनमें से अधिकांश दल सत्ता में हैं।

भारतीय राजनीतिक दलों की समस्याएं का निष्कर्ष (Conclusion)-

भारतीय राजनीतिक दलों की समस्याएं से यह स्पष्ट है कि राजनीतिक दलों उन महान गुणों का अभाव है जो राजनीतिक दलों और लोकतंत्र की सफलता के लिए आवश्यक हैं। ऊपर कुछ भारतीय राजनीतिक दलों की समस्याएं हैं जो संसदीय प्रणाली, लोकतंत्र, और राजनीतिक दलों की सफलता के लिए घातक साबित हो रही हैं।
तो दोस्तों आपको हमारा ये भारतीय राजनीतिक दलों की समस्याएं का लेख कैसा लगा हमें कमेंट के माधयम से जरूर बताये।
Source: विकिपीडिया,
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